रहमत अगर क़ुबूल करे क्या बईद है
शर्मिंदगी से उज़्र न करना गुनाह का
“If mercy accepts, what could be beyond its grace?When out of shame, for a sin, no excuse finds its place.”
— मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ
यदि दया स्वीकार करे, तो यह कोई असंभव बात नहीं है कि व्यक्ति अपने गुनाह के लिए शर्मिंदगी के कारण कोई बहाना न करे।
विस्तार
यह सुंदर शेर गहरी भावनाओं और दर्शन की खोज करता है। ग़ालिब ने बेहतरीन तरीके से प्रेम, लालसा और आध्यात्मिक खोज के विषयों को जोड़ा है, जो शताब्दियों से प्रेरणा देता है।
Comments
Read-only on web. Join the conversation in the Sukhan AI mobile app.
No comments yet.
