ज़ोफ़ में ताना-ए-अग़्यार का शिकवा क्या है बात कुछ सर तो नहीं है कि उठा भी न सकूँ

“Why complain in my frail state of the rivals' mocking tone? Words are not a heavy head that I cannot bear to raise.”

— मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ

कमज़ोरी की हालत में गै़रों के तानों का क्या शिकवा करना? बात कोई भारी सर तो नहीं है कि मैं उसे उठा या बर्दाश्त भी न कर सकूँ।

विस्तार

इस शेर में शायर अपनी शारीरिक कमज़ोरी के बावजूद गज़ब की खुददारी और सब्र दिखाता है। वह कहता है कि ज़ोफ़ (कमज़ोरी) के दौर में गै़रों के तानों का क्या शिकवा करना, क्योंकि कड़वी बातें कोई भारी बोझ या सिर तो नहीं हैं जिसे इंसान उठा या बर्दाश्त न कर सके। यहाँ 'उठाना' लफ़्ज़ के सहारे शायर ने खूबसूरती से ज़ाहिर किया है कि जिस्म भले ही लाचार हो जाए, लेकिन इंसान का स्वाभिमान और हौसला दुनिया की ज़हरखंद बातों को आसानी से दरकिनार कर देता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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