ग़ज़ल

वो फ़िराक़ और वो विसाल कहाँ

وہ فراق اور وہ وصال کہاں
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 10 shers· radif: कहाँ

यह ग़ज़ल बीते हुए प्रेम के गहन अनुभवों, चाहे वह विरह हो या मिलन, के लुप्त हो जाने पर शोक व्यक्त करती है। कवि पूछता है कि वे भावुक रातें और दिन कहाँ चले गए, और वर्तमान में प्रेम के व्यापार या सौंदर्य की प्रशंसा के लिए अवकाश और रुचि की कमी पर अफसोस जताता है। यह ग़ज़ल एक मार्मिक अतीत की याद और युवा जोश के फीके पड़ जाने की भावना को व्यक्त करती है।

Source: rekhta · HI

गीत सुनें
लिपि व अर्थ
1
वो फ़िराक़ और वो विसाल कहाँ वो शब-ओ-रोज़ ओ माह-ओ-साल कहाँ
वे बिछड़ने और मिलने के पल कहाँ चले गए, और वे रातें, दिन, महीने और साल कहाँ हैं? यह बीते हुए समय और खोई हुई भावनाओं के लिए एक विलाप है।
2
फ़ुर्सत-ए-कारोबार-ए-शौक़ किसे ज़ौक़-ए-नज़्ज़ारा-ए-जमाल कहाँ
किसे प्रेम और शौक के जटिल कार्यों के लिए फ़ुर्सत है? और सौंदर्य को निहारने का आनंद और रुचि कहाँ है?
3
दिल तो दिल वो दिमाग़ भी न रहा शोर-ए-सौदा-ए-ख़त्त-ओ-ख़ाल कहाँ
दिल तो दिल, वो दिमाग़ भी अब पहले जैसा नहीं रहा। चेहरे के नक़्श-ओ-निगार के लिए वो शोरगुल और जुनून अब कहाँ है?
4
थी वो इक शख़्स के तसव्वुर से अब वो रानाई-ए-ख़याल कहाँ
वह सुंदरता किसी एक व्यक्ति के कल्पना से उत्पन्न हुई थी। अब वैसी विचार की सुंदरता कहाँ है?
5
ऐसा आसाँ नहीं लहू रोना दिल में ताक़त जिगर में हाल कहाँ
लहू रोना इतना आसान नहीं है। दिल में इतनी ताक़त कहाँ और जिगर में वह हाल या हौसला कहाँ कि ऐसा गहरा दुख सह सके और व्यक्त कर सके?
6
हम से छूटा क़िमार-ख़ाना-ए-इश्क़ वाँ जो जावें गिरह में माल कहाँ
हमने इश्क़ का जुआखाना छोड़ दिया है। अब अगर हम वहाँ जाएँ, तो हमारी जेब में धन (दांव लगाने के लिए) कहाँ है?
7
फ़िक्र-ए-दुनिया में सर खपाता हूँ मैं कहाँ और ये वबाल कहाँ
मैं दुनिया की चिंताओं में अपना सर खपाता हूँ। मैं कहाँ और ये मुसीबत/झंझट कहाँ? (यहां कवि अपने आप को इन झंझटों से अलग महसूस कर रहा है)।
8
मुज़्महिल हो गए क़वा ग़ालिब वो अनासिर में ए'तिदाल कहाँ
ऐ ग़ालिब, मेरी शारीरिक और मानसिक शक्तियाँ कमज़ोर हो गई हैं। मेरे अस्तित्व के तत्वों में वो संतुलन और सामंजस्य अब कहाँ रहा?
9
बोसे में वो मुज़ाइक़ा न करे पर मुझे ताक़त-ए-सवाल कहाँ
शायद वो बोसा देने में इंकार न करे, किंतु मुझमें पूछने की हिम्मत ही कहाँ है?
10
फ़लक-ए-सिफ़्ला बे-मुहाबा है इस सितम-गर को इंफ़िआल कहाँ
यह नीच आसमान बिल्कुल बेशर्म है; इस ज़ालिम को शर्मिंदगी कहाँ होगी?
Comments · 0

Free — just your email. You'll come right back here.

No comments yet. Be the first.