फ़िक्र-ए-दुनिया में सर खपाता हूँ मैं कहाँ और ये वबाल कहाँ

“I wear out my head in worldly thought,Where am I, and where these troubles brought?”

— मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ

मैं दुनिया की चिंताओं में अपना सर खपाता हूँ। मैं कहाँ और ये मुसीबत/झंझट कहाँ? (यहां कवि अपने आप को इन झंझटों से अलग महसूस कर रहा है)।

विस्तार

यह सुंदर शेर गहरी भावनाओं और दर्शन की खोज करता है। ग़ालिब ने बेहतरीन तरीके से प्रेम, लालसा और आध्यात्मिक खोज के विषयों को जोड़ा है, जो शताब्दियों से प्रेरणा देता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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