“You knew no measure of my true worth—what lack of taste, what narrow sight!”
तुमने मेरी ज़रा भी क़द्र नहीं पहचानी; यह तुम्हारी कैसी बे-ज़ौक़ी और कम-नज़री है।
यहाँ शायर अपने महबूब से एक गहरा शिकवा कर रहा है, जिसमें दर्द के साथ-साथ एक स्वाभिमान भी छुपा है। वह कहता है कि तुमने मेरी कद्र नहीं जानी, और यह मेरी कमी नहीं बल्कि तुम्हारी अपनी समझ और नज़र की कमज़ोरी है। 'बे-सवादी' और 'कम-निगाही' जैसे लफ़्ज़ों से वह तंज़ कसता है कि तुम्हारे पास तो किसी अनमोल चीज़ की परख करने का सलीक़ा ही नहीं है। यह शेर उस टीस को बड़ी सादगी से छू लेता है जब कोई नादान आपकी मोहब्बत को पहचान नहीं पाता।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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