लुत्फ़-ए-कलाम क्या जो न हो दिल में दर्द-ए-इश्क़ बिस्मिल नहीं है तू तो तड़पना भी छोड़ दे

“What joy can words impart without love's ache within the heart? If you are not the wounded prey, then cease to writhe and play the part.”

— अल्लामा इक़बाल
अर्थ

अगर दिल में इश्क़ का दर्द ही न हो तो बातचीत या शायरी का क्या मज़ा? और अगर तुम वास्तव में घायल नहीं हो, तो तड़पना भी छोड़ दो।

विस्तार

शायर यहाँ कलाम यानी शायरी की रूह को बयाँ करते हुए कहते हैं कि जब तक दिल में इश्क़ का सच्चा दर्द न हो, तब तक बातों में कोई असर या लुत्फ़ नहीं आ सकता। 'बिस्मिल' उस परिंदे या शिकार को कहते हैं जो तीर खाकर तड़पता है; यानी अगर आप पर मोहब्बत का असली ज़ख़्म नहीं लगा, तो बनावटी तड़प का दिखावा छोड़ दीजिए। असल बात यह है कि वही शायरी सीधे दिल में उतरती है जो महज़ लफ़्फ़ाज़ी न होकर दिल के सच्चे घावों से निकलती है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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