ग़ज़ल

अल्लाह अगर तौफ़ीक़ न दे इंसान के बस का काम नहीं

اللہ اگر توفیق نہ دے انسان کے بس کا کام نہیں
जिगर मुरादाबादी· Ghazal· 8 shers· radif: नहीं

यह ग़ज़ल ईश्वरीय कृपा और मार्गदर्शन के महत्व को रेखांकित करती है, जिसके बिना मनुष्य के लिए प्रेम और आध्यात्मिकता की वास्तविक समझ पाना असंभव है। इसमें मनुष्य को अपनी सोच और दृष्टि व्यापक करने की प्रेरणा दी गई है, क्योंकि कुदरत की उदारता हर उस व्यक्ति के लिए असीम है जो उसे देखने की समझ रखता है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
अल्लाह अगर तौफ़ीक़ न दे इंसान के बस का काम नहीं फ़ैज़ान-ए-मोहब्बत आम सही इरफ़ान-ए-मोहब्बत आम नहीं
अगर ईश्वर कृपा और सामर्थ्य न दे तो यह इंसान के बस की बात नहीं है। प्रेम का प्रभाव भले ही आम हो, लेकिन प्रेम की सच्ची समझ और पहचान हर किसी के हिस्से में नहीं आती।
2
ये तू ने कहा क्या ऐ नादाँ फ़य्याज़ी-ए-क़ुदरत आम नहीं तू फ़िक्र ओ नज़र तो पैदा कर क्या चीज़ है जो इनआम नहीं
ऐ नादान, तूने यह क्या कह दिया कि कुदरत की उदारता सबके लिए आम नहीं है? तू ज़रा अपने अंदर सोच और दृष्टि तो पैदा कर, फिर देख कि कौन सी चीज़ उपहार नहीं है।
3
या-रब ये मक़ाम-ए-इश्क़ है क्या गो दीदा-ओ-दिल नाकाम नहीं तस्कीन है और तस्कीन नहीं आराम है और आराम नहीं
हे ईश्वर, यह प्रेम का कैसा मुक़ाम है? यद्यपि आँखें और दिल नाकाम नहीं हुए हैं, फिर भी यहाँ सुकून है और नहीं भी है, आराम है और नहीं भी है।
4
क्यूँ मस्त-ए-शराब-ए-ऐश-ओ-तरब तकलीफ़-ए-तवज्जोह फ़रमाएँ आवाज़-ए-शिकस्त-ए-दिल ही तो है आवाज़-ए-शिकस्त-ए-जाम नहीं
ऐश-ओ-आराम की शराब में डूबे लोग ध्यान देने का कष्ट क्यों करें? यह महज़ दिल टूटने की आवाज़ है, किसी शराब के प्याले के टूटने की आवाज़ नहीं।
5
आना है जो बज़्म-ए-जानाँ में पिंदार-ए-ख़ुदी को तोड़ के आ ऐ होश-ओ-ख़िरद के दीवाने याँ होश-ओ-ख़िरद का काम नहीं
अगर महबूब की महफ़िल में आना है तो अपने अहंकार और ख़ुदी के घमंड को तोड़ कर आओ। ऐ अक़्ल और होश के दीवाने, यहाँ समझदारी और अक़्लमंदी का कोई काम नहीं है।
6
ज़ाहिद ने कुछ इस अंदाज़ से पी साक़ी की निगाहें पड़ने लगीं मय-कश यही अब तक समझे थे शाइस्ता दौर-ए-जाम नहीं
ज़ाहिद ने शराब इतने सलीके से पी कि साक़ी की नज़रें उस पर टिक गईं, जबकि शराबी अब तक यही समझते थे कि वह शराब की महफ़िल के क़ाबिल नहीं है।
7
इश्क़ और गवारा ख़ुद कर ले बे-शर्त शिकस्त-ए-फ़ाश अपनी दिल की भी कुछ उन के साज़िश है तन्हा ये नज़र का काम नहीं
इश्क़ अपनी बिना शर्त और साफ़ हार कभी ख़ुद स्वीकार नहीं कर सकता; इसमें ज़रूर उनके दिल की भी कोई साज़िश है, क्योंकि यह केवल नज़रों का काम नहीं हो सकता।
8
सब जिस को असीरी कहते हैं वो तो है अमीरी ही लेकिन वो कौन सी आज़ादी है यहाँ जो आप ख़ुद अपना दाम नहीं
जिसे सब क़ैद कहते हैं वह तो असल में अमीरी ही है, लेकिन इस दुनिया में ऐसी कौन सी आज़ादी है जो ख़ुद अपना ही जाल न हो?
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