“Let it be the pain of deprivation, let it be the sting of defeat; at least, in some measure, they deemed me worthy of something.”
भले ही मुझे महरूमी का दर्द और नाकामी का एहसास मिला हो, लेकिन कम से कम उसने मुझे किसी चीज़ के क़ाबिल तो समझा।
इस शेर में नाकामी और दर्द का एक बेहद खूबसूरत और दिलकश पहलू दिखाया गया है। शायर कहता है कि इश्क़ में उसे महरूमी और हार तो मिली, लेकिन तसल्ली इस बात की है कि महबूब ने उसे बिल्कुल बेगाना नहीं समझा। दर्द या इम्तिहान देने के लिए भी किसी को इस लायक समझना पड़ता है, और आशिक़ इसी बात में अपनी इज़्ज़त तलाश लेता है। महबूब की मुकम्मल बेरुखी से तो यह चोट कहीं बेहतर है, क्योंकि इसमें कम से कम उसकी तवज्जो तो शामिल है।
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