ग़ज़ल
फ़िक्र-ए-मंज़िल है न होश-ए-जादा-ए-मंज़िल मुझे
فکر منزل ہے نہ ہوش جادۂ منزل مجھے
इस ग़ज़ल में शायर मंज़िल और रास्ते की फ़िक्र भुलाकर पूरी तरह दिल के इशारों पर बहने की बेख़ुदी और दीवानगी का इज़हार करता है। वह तकलीफ़ और दर्द को भी एक रूहानी तोहफ़ा मानकर क़बूल करता है और इसके बदले रब की बारगाह में शुक्र अदा करने की तौफ़ीक़ माँगता है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
फ़िक्र-ए-मंज़िल है न होश-ए-जादा-ए-मंज़िल मुझे
जा रहा हूँ जिस तरफ़ ले जा रहा है दिल मुझे
मुझे न तो मंज़िल की कोई फ़िक्र है और न ही उस तक पहुँचने वाले रास्ते का कोई होश है; मेरा दिल मुझे जिस तरफ़ ले जा रहा है, मैं बस उसी ओर जा रहा हूँ।
2
अब ज़बाँ भी दे अदा-ए-शुक्र के क़ाबिल मुझे
दर्द बख़्शा है अगर तू ने बजाए-दिल मुझे
अगर तूने मुझे दिल के बदले सिर्फ़ दर्द दिया है, तो अब मुझे ऐसी ज़ुबान भी दे जो इस दर्द के लिए तेरा शुक्र अदा करने के क़ाबिल हो।
3
यूँ तड़प कर दिल ने तड़पाया सर-ए-महफ़िल मुझे
उस को क़ातिल कहने वाले कह उठे क़ातिल मुझे
महफ़िल में मेरे दिल ने तड़पकर मुझे इस तरह बेहाल किया कि जो लोग महबूब को क़ातिल कहते थे, वे मुझे ही क़ातिल कहने लगे।
4
अब किधर जाऊँ बता ऐ जज़्बा-ए-कामिल मुझे
हर तरफ़ से आज आती है सदा-ए-दिल मुझे
हे परिपूर्ण प्रेम/जज़्बे, अब मुझे बता कि मैं किस दिशा में जाऊँ, क्योंकि आज मुझे हर तरफ़ से अपने ही दिल की पुकार सुनाई दे रही है।
5
रोक सकती हो तो बढ़ कर रोक ले मंज़िल मुझे
हर तरफ़ से आज आती है सदा-ए-दिल मुझे
अगर मंज़िल मुझे रोक सकती है तो आगे बढ़कर रोक ले, क्योंकि आज मुझे हर तरफ़ से अपने दिल की आवाज़ सुनाई दे रही है।
6
जान दी कि हश्र तक मैं हूँ मिरी तन्हाइयाँ
हाँ मुबारक फ़ुर्सत-ए-नज़्ज़ारा-ए-क़ातिल मुझे
मैंने अपनी जान इसलिए दे दी ताकि क़यामत तक सिर्फ़ मैं और मेरा अकेलापन रहे; मुझे अपने क़ातिल का दीदार करने की यह फ़ुर्सत मुबारक हो।
7
हर इशारे पर है फिर भी गर्दन-ए-तस्लीम ख़म
जानता हूँ साफ़ धोके दे रहा है दिल मुझे
मैं भली-भाँति जानता हूँ कि मेरा दिल मुझे साफ़ धोखा दे रहा है, फिर भी उसके हर इशारे पर मेरा सिर झुक जाता है।
8
जा भी ऐ नासेह कहाँ का सूद और कैसा ज़ियाँ
इश्क़ ने समझा दिया है इश्क़ का हासिल मुझे
ऐ नसीहत देने वाले, तू चला जा, यहाँ नफ़ा और नुक़सान की क्या बात! मुझे तो इश्क़ ने खुद ही समझा दिया है कि इश्क़ का असली हासिल क्या है।
9
मैं अज़ल से सुब्ह-ए-महशर तक फ़रोज़ाँ ही रहा
हुस्न समझा था चराग़-ए-कुश्ता-ए-महफ़िल मुझे
मैं सृष्टि की शुरुआत से क़यामत की सुबह तक लगातार रोशन ही रहा, जबकि हुस्न ने मुझे महफ़िल का बुझा हुआ चिराग़ समझ लिया था।
10
ख़ून-ए-दिल रग रग में जम कर रह गया इस वहम से
बढ़ के सीने से न लिपटा ले मिरा क़ातिल मुझे
मेरे दिल का ख़ून हर रग में इस डर और वहम से जम कर रह गया कि कहीं मेरा क़ातिल आगे बढ़कर मुझे अपने सीने से न लगा ले।
11
कैसा क़तरा कैसा दरिया किस का तूफ़ाँ किस की मौज
तू जो चाहे तो डुबो दे ख़ुश्की-ए-साहिल मुझे
बूँद, नदी, तूफ़ान या लहरों की क्या बिसात है? यदि तेरी मर्ज़ी हो, तो किनारे की सूखी ज़मीन भी मुझे डुबो सकती है।
12
फूँक दे ऐ ग़ैरत-ए-सोज़-ए-मोहब्बत फूँक दे
अब समझती हैं वो नज़रें रहम के क़ाबिल मुझे
ऐ प्रेम की तपन के स्वाभिमान, मुझे जलाकर राख कर दे, क्योंकि अब महबूब की नज़रें मुझे तरस खाने के क़ाबिल समझने लगी हैं।
13
तोड़ कर बैठा हूँ राह-ए-शौक़ में पा-ए-तलब
देखना है जज़्बा-ए-बे-ताबी-ए-मंज़िल मुझे
मैंने चाहत की राह में अपनी खोज का पाँव तोड़ लिया है और बैठ गया हूँ; अब मुझे देखना है कि मंज़िल की अपनी बेताबी मुझे किस तरह अपनी ओर खींचती है।
14
ऐ हुजूम-ए-ना-उमीदी शाद-बाश-ओ-ज़िंदा-बाश
तू ने सब से कर दिया बेगाना-ओ-ग़ाफ़िल मुझे
ऐ निराशा के हुजूम, तू खुश रह और सलामत रह, क्योंकि तूने मुझे हर किसी से अनजान और बेखबर कर दिया है।
15
दर्द-ए-महरूमी सही एहसास-ए-नाकामी सही
उस ने समझा तो बहर-सूरत किसी क़ाबिल मुझे
भले ही मुझे महरूमी का दर्द और नाकामी का एहसास मिला हो, लेकिन कम से कम उसने मुझे किसी चीज़ के क़ाबिल तो समझा।
16
ये भी क्या मंज़र है बढ़ते हैं न रुकते हैं क़दम
तक रहा हूँ दूर से मंज़िल को मैं मंज़िल मुझे
यह कैसा अजीब दृश्य है कि मेरे क़दम न तो आगे बढ़ रहे हैं और न ही रुक रहे हैं; मैं दूर से अपनी मंज़िल को देख रहा हूँ और मंज़िल मुझे देख रही है।
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