मिलता है क्यूँ मज़ा सितम-ए-रोज़गार में तेरा करम भी ख़ुद जो शरीक-ए-सितम नहीं

“Why do I find delight in the world's relentless cruelty, when even your own grace is not complicit in this torment?”

— जिगर मुरादाबादी
अर्थ

ज़माने के सितम में मुझे मज़ा क्यों मिलता है, जबकि इस ज़ुल्म में ख़ुद तुम्हारी इनायत भी शामिल नहीं है?

विस्तार

आमतौर पर एक आशिक़ को तकलीफ़ में भी मज़ा तब आता है जब वह दर्द महबूब का दिया हुआ हो। लेकिन यहाँ शायर हैरान होकर खुद से पूछता है कि ज़माने के बेदर्द सितम सहने में उसे यह अजीब सा लुत्फ़ क्यों मिल रहा है, जबकि इसमें उसके महबूब की इनायत या मौजूदगी तक शामिल नहीं है। यह शेर दिल की उस गहरी उदासी को दिखाता है जहाँ इंसान दुखों का इतना आदी हो जाता है कि दर्द ही उसका सहारा बन जाता है।

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