ग़ज़ल

हम को मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं

ہم کو مٹا سکے یہ زمانے میں دم نہیں
जिगर मुरादाबादी· Ghazal· 8 shers· radif: नहीं

यह ग़ज़ल अदम्य आत्मविश्वास, मानवीय गरिमा और आत्मसम्मान की सशक्त अभिव्यक्ति है। इसमें यह संदेश दिया गया है कि ज़माना इंसान से बनता है न कि इंसान ज़माने से, और जीवन के ग़म भी ईश्वर की कृपा से आत्मा को निखारने वाली नियामत बन जाते हैं।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
हम को मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं हम से ज़माना ख़ुद है ज़माने से हम नहीं
ज़माने में इतनी ताक़त नहीं है कि वह हमें मिटा सके; यह ज़माना ख़ुद हमारे होने से है, हम ज़माने की वजह से नहीं हैं।
2
बे-फ़ाएदा अलम नहीं बे-कार ग़म नहीं तौफ़ीक़ दे ख़ुदा तो ये नेमत भी कम नहीं
दुख और पीड़ा व्यर्थ नहीं होते। यदि ईश्वर इसे सहने और समझने का सामर्थ्य दे, तो यह ग़म भी किसी बड़ी नेमत से कम नहीं है।
3
मेरी ज़बाँ पे शिकवा-ए-अहल-ए-सितम नहीं मुझ को जगा दिया यही एहसान कम नहीं
मेरी ज़ुबान पर ज़ुल्म करने वालों की कोई शिकायत नहीं है; उन्होंने मुझे ग़फ़लत से जगा दिया, यही उनका कोई छोटा एहसान नहीं है।
4
या रब हुजूम-ए-दर्द को दे और वुसअ'तें दामन तो क्या अभी मिरी आँखें भी नम नहीं
हे ईश्वर, मेरे दर्दों की भीड़ को और अधिक विस्तार दे; दामन भीगना तो दूर की बात है, अभी तो मेरी आँखें भी नम नहीं हुई हैं।
5
शिकवा तो एक छेड़ है लेकिन हक़ीक़तन तेरा सितम भी तेरी इनायत से कम नहीं
मेरी शिकायत तो केवल एक छेड़छाड़ या दिल्लगी है, जबकि असलियत में तुम्हारा सितम भी तुम्हारी मेहरबानी से कम नहीं है।
6
अब इश्क़ उस मक़ाम पे है जुस्तुजू-नवर्द साया नहीं जहाँ कोई नक़्श-ए-क़दम नहीं
इश्क़ की तलाश अब ऐसे मुक़ाम पर पहुँच चुकी है जहाँ न कोई साया है और न ही किसी के क़दमों का कोई निशान बचा है।
7
मिलता है क्यूँ मज़ा सितम-ए-रोज़गार में तेरा करम भी ख़ुद जो शरीक-ए-सितम नहीं
ज़माने के सितम में मुझे मज़ा क्यों मिलता है, जबकि इस ज़ुल्म में ख़ुद तुम्हारी इनायत भी शामिल नहीं है?
8
मर्ग-ए-'जिगर' पे क्यूँ तिरी आँखें हैं अश्क-रेज़ इक सानेहा सही मगर इतना अहम नहीं
'जिगर' की मौत पर तुम्हारी आँखें आँसू क्यों बहा रही हैं? यह एक हादसा सही, लेकिन इतना भी महत्वपूर्ण नहीं है।
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