“The true colors of the garden grow radiant and bright, as weeds and withered thorns keep burning away.”
बाग़ का रूप-रंग निखरता जा रहा है क्योंकि घास-फूस और कूड़ा-करकट जलते जा रहे हैं।
इस शेर में शायर ने बाग़ और आग के बेहद खूबसूरत रूपक से ज़िंदगी के एक गहरे सच को बयां किया है। जब चमन से सूखे तिनके, घास-फूस और कूड़ा-करकट जलकर ख़ाक होने लगते हैं, तो पहली नज़र में यह तबाही लग सकती है, मगर असल में इसी सफ़ाई से बाग़ का असली निखार और ताज़गी उभर कर सामने आती है। ठीक वैसे ही, ज़िंदगी या समाज में जब मुश्किलों और इंक़लाब की आग पुरानी बुराइयों और कमज़ोरियों को जला देती है, तब एक नया और ख़ूबसूरत दौर जन्म लेता है।
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