कभी शाख़ ओ सब्ज़ा ओ बर्ग पर कभी ग़ुंचा ओ गुल ओ ख़ार पर मैं चमन में चाहे जहाँ रहूँ मिरा हक़ है फ़स्ल-ए-बहार पर

“Be it on the bough, the leaf, or blade, or upon the bud, the bloom, the thorn; Wherever in the garden I abide, mine is the rightful claim to spring.”

— जिगर मुरादाबादी
अर्थ

चाहे मैं डाली, हरियाली और पत्तों पर रहूँ या कली, फूल और काँटों पर; मैं बाग़ में चाहे जहाँ भी रहूँ, बहार के मौसम पर मेरा पूरा अधिकार है।

विस्तार

इस ख़ूबसूरत शेर में शायर बाग़ के हर हिस्से पर अपना हक़ जताते हुए ज़िंदगी और अपनी आज़ादी का गहरा एहसास बयां करता है। चमन की शाख़, पत्तियां, फूल और यहाँ तक कि कांटे भी ज़िंदगी के सुख-दुख और उतार-चढ़ाव की अलामत हैं। शायर कहता है कि हालात उसे बाग़ के चाहे किसी भी कोने में रखें, बहार की उम्मीद और ख़ुशी पर उसका हक़ हमेशा बरक़रार रहेगा। यह शेर इंसान के स्वाभिमान और ज़िंदगी से कभी न टूटने वाले रिश्ते की बड़ी दिलकश तस्वीर है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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