“Bound to pain I may well be, yet what else could I desire, O Jigar? / The beloved's sorrow is enchanted by me, and I am enraptured by the beloved's sorrow.”
ऐ जिगर, भले ही मैं दर्द में जकड़ा हुआ हूँ, पर मुझे इसके सिवा और क्या चाहिए? महबूब का ग़म मुझ पर फ़िदा है और मैं महबूब के ग़म पर आशिक़ हूँ।
जिगर मुरादाबादी यहाँ इश्क़ के उस अनोखे मुक़ाम की बात कर रहे हैं जहाँ दर्द कोई सज़ा नहीं, बल्कि महबूब की दी हुई सबसे अनमोल अमानत बन जाता है। वे महबूब के ग़म को एक जीते-जागते हमसफ़र की तरह देखते हैं—एक तरफ़ ग़म शायर पर फ़िदा है, और दूसरी तरफ़ शायर उस ग़म का दीवाना है। जब उदासी और आशिक़ के दरमियान ऐसा गहरा और ख़ूबसूरत रिश्ता बन जाए, तो फिर दिल को किसी और ख़ुशी की तलब ही नहीं रह जाती।
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