कसरत में भी वहदत का तमाशा नज़र आया जिस रंग में देखा तुझे यकता नज़र आया

“Even amidst multiplicity, the spectacle of Oneness shone through; in whatever hue I beheld You, You appeared singular and One.”

— जिगर मुरादाबादी
अर्थ

अनेकता और विविधता के बीच भी केवल एकत्व का ही तमाशा दिखाई दिया, और मैंने तुझे जिस रूप या रंग में भी देखा, तू हमेशा अद्वितीय और एक ही नज़र आया।

विस्तार

यह शेर सूफ़ियाना फ़लसफ़े की उस ख़ूबसूरत समझ को सामने लाता है जहाँ दुनिया के बिखराव में भी एक ही हक़ीक़त दिखाई देती है। शायर कहता है कि इस जहान में अनगिनत रंग, रूप और चेहरे (कसरत) होने के बावजूद, हर मंज़र में उसे बस वही एक महबूब या रब (वहदत) नज़र आता है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे एक ही सूरज की किरणें हज़ारों शीशों से टकराकर मुख़्तलिफ़ रंग बिखेरती हैं, मगर उन तमाम रंगों की जान वही एक अकेली रोशनी होती है।

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