“It is but a fleeting shade, my dear—whose is the desert, what is the garden?”
हे प्यारे, यह सब तो एक चलती-फिरती छाँव की तरह अस्थायी है; यहाँ न किसी का कोई रेगिस्तान है और न ही किसी का कोई चमन।
शायर यहाँ बड़ी नज़ाकत से समझाते हैं कि यह ज़िंदगी चलती-फिरती छाँव की तरह है, जो कभी एक जगह नहीं ठहरती। जब सब कुछ इतना अस्थाई है, तो फिर दुखों का तपता सहरा कैसा और खुशियों का महकता गुलशन कैसा? यह शेर हमें याद दिलाता है कि सुख और दुख दोनों ही महज़ मुसाफ़िर हैं, इसलिए किसी भी हाल में न बहुत इतराना चाहिए और न ही मायूस होना।
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