काँटों का भी हक़ है कुछ आख़िर
कौन छुड़ाए अपना दामन
“Thorns too have some right, after all; who would wrench their hem away?”
— जिगर मुरादाबादी
अर्थ
आख़िरकार काँटों का भी कुछ हक़ बनता है, इसलिए भला कौन उनसे अपना दामन छुड़ाए।
विस्तार
उर्दू शायरी में काँटों और दामन का रिश्ता बहुत गहरा है, जहाँ काँटे दर्द और आज़माइशों का प्रतीक हैं। शायर बड़ी नज़ाकत से कहता है कि ज़िंदगी में सिर्फ़ फूलों या ख़ुशियों का ही हक़ नहीं होता, बल्कि तकलीफ़ों और ज़ख़्मों का भी अपना एक मुक़ाम है। इसलिए दामन छुड़ाने की जल्दबाज़ी करने के बजाय, वह दर्द को भी अपने सफ़र का एक सच्चा और हक़दार साथी मानकर अपना लेता है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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