“Does love ever hold an equal sway on either side? O cruel one, the heart settles neither here nor there.”
क्या प्यार का असर दोनों तरफ कभी एक जैसा होता है? ऐ ज़ालिम, यह दिल न पूरी तरह इधर का रहता है और न उधर का।
इस खूबसूरत शेर में शायर प्यार के उस दर्द को बयां कर रहा है जहाँ जज़्बात कभी दोनों तरफ़ बराबर नहीं होते। महबूब को एक मीठे शिकवे के साथ 'ज़ालिम' कहते हुए वह दिल की अजब कश्मकश दिखाता है—यह दिल न अब अपने पास रहा और न पूरी तरह तुम्हारा हो सका। यह उस तड़प और बेचैनी की तस्वीर है जिसमें आशिक खुद को दो किनारों के बीच अधर में लटका हुआ पाता है।
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