दिल तो यूँ दिल से मिलाया कि न रक्खा मेरा अब नज़र के लिए क्या हुक्म-ए-नज़र होता है

“You joined heart to heart in such a way that mine was spared no more; now let us see what decree is pronounced upon the gaze.”

— जिगर मुरादाबादी
अर्थ

तुमने दिल को दिल से इस तरह मिलाया कि मेरा दिल मेरे पास रहने ही न दिया; अब देखते हैं कि नज़र के लिए क्या हुक्म जारी होता है।

विस्तार

इस शेर में आशिक़ अपने दिल के पूरी तरह लुट जाने की दास्तान बड़े नाज़ुक अंदाज़ में कह रहा है। महबूब ने दिल से ऐसा गहरा नाता जोड़ा कि आशिक़ का अपना दिल ही उसके पास न रहा, गोया उसकी सारी स्वायत्तता छिन गई। दिल तो अब महबूब की मलकियत हो चुका है, इसलिए आशिक़ मीठे समर्पण के साथ इंतज़ार कर रहा है कि उसकी आँखों के लिए उस हुस्न-ए-नज़र का क्या फ़रमान आता है—दीदार की इजाज़त मिलती है या पलकें झुका लेने का हुक्म।

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