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ग़ज़ल

कबीर 111-120

کبیر ١١١-١٢٠
कबीर· Ghazal· 10 shers

कबीर के ये पद ईश्वर के धीमे और निरंतर स्मरण के महत्व पर जोर देते हैं। ये सृष्टि की एकता को दर्शाते हैं, कि जब मूल स्रोत को समझ लिया जाता है, तो सब कुछ स्पष्ट हो जाता है। ये पद ईश्वरीय प्रेम के माध्यम से सांसारिक सुख-दुःख से परे जाने और गहन आध्यात्मिक अनुभूति की बात करते हैं।

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1
सुमरण की सुब्यों करो ज्यों गागर पनिहारहोले-होले सुरत में , कहैं कबीर विचार111
सुमिरन की बूंदों को ऐसे बरसाओ, जैसे एक घड़े से पानी बरसाता है। धीरे-धीरे, धीरे-धीरे, शायर तुम्हारे रूप में विचार करता है।
2
सब आए इस एक में , डाल-पात फल-फूलकबिरा पीछा क्या रहा , गह पकड़ी जब मूल112
सब कुछ, चाहे वह शाखाएं हों, पत्ते हों, फल हों या फूल, ये सब इस एक में समाहित हैं; जब कबीर ने मूल को पकड़ लिया, तो वह किसका पीछा कर रहा था।
3
जो जन भीगे रामरस , विगत कबहूँ ना रूखअनुभव भाव दरसते , ना दु: ना सुख113
जो व्यक्ति राम के रस में भीग जाता है, उसे कभी कोई दुख नहीं होता। उसमें न सुख, न दुख, न भाव और न अनुभव दिखाई देते हैं।
4
सिंह अकेला बन रहे , पलक-पलक कर दौरजैसा बन है आपना , तैसा बन है और114
शेर अकेला घूम रहा है, पलक-पलक कर चक्कर लगा रहा है। जैसा आपका स्वभाव है, वैसा ही आपका अस्तित्व है।
5
यह माया है चूहड़ी , और चूहड़ा कीजोबाप-पूत उरभाय के , संग ना काहो केहो115
यह माया एक चूहड़ी और चूहड़ा जैसी है, जिसका अर्थ है कि यह भ्रम और मूर्खता का मिश्रण है। अतः, बाप और पुत्र (यानी, जो भी इसमें शामिल हैं) उरभाय के साथ कोई संबंध न रखें।
6
जहर की जर्मी में है रोपा , अभी खींचे सौ बारकबिरा खलक तजे , जामे कौन विचार116
जहर के बीज में रोपा गया है, जिसे सौ बार खींचा जाएगा। ओ कबीर की दुनिया, जन्म और मृत्यु के चक्र से कौन मुक्ति का विचार कर सकता है।
7
जग मे बैरी कोई नहीं , जो मन शीतल होययह आपा तो डाल दे , दया करे सब कोय117
कवि कहते हैं कि संसार में कोई शत्रु नहीं होता, जिसके मन में शीतलता हो। यदि आप अपने अहंकार को त्याग दें, तो सभी लोग दया करेंगे।
8
जो जाने जीव आपना , करहीं जीव का सारजीवा ऐसा पाहौना , मिले ना दूजी बार118
जो व्यक्ति अपना जीवन नहीं जानता, वह दूसरों के जीवन को बचाने की कोशिश करता है। ऐसा जीवन दोबारा पाना बहुत मुश्किल है।
9
कबीर जात पुकारया , चढ़ चन्दन की डारबाट लगाए ना लगे फिर क्या लेत हमार119
कबीर ने पुकारकर कहा, 'मैं चंदन के रास्ते पर चढ़ गया हूँ। यदि रास्ता नहीं मिला, तो फिर हम क्या करेंगे?'
10
लोग भरोसे कौन के , बैठे रहें उरगायजीय रही लूटत जम फिरे , मैँढ़ा लुटे कसाय120
लोग किस पर भरोसा करके बैठे रहें, हे उरगाय। मैं तो जीकर लूटती हूँ, जंगल में घूमकर, और सामान लूटकर।
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