ऐसी वाणी बोलिए , मन का आपा खोए। औरन को शीतल करे , आपौ शीतल होय॥ 150॥
“Speak words like this, losing the self's conceit; which cools others, and gives coolness to the self.”
— कबीर
अर्थ
ऐसी वाणी बोलनी चाहिए, जिसमें अहंकार न हो। ऐसी वाणी दूसरों को शांति देती है और स्वयं को भी शीतलता प्रदान करती है।
विस्तार
कबीरदास जी इस दोहे में हमें वाणी की विनम्रता का पाठ पढ़ाते हैं। वे कहते हैं कि हमें ऐसे बोल बोलने चाहिए जिससे हमारे मन का अहंकार दूर हो जाए। जब हमारी वाणी शीतल और मधुर होती है, तो यह दूसरों को तो शांति देती ही है, साथ ही हमें खुद को भी आंतरिक सुकून मिलता है। यह दरअसल बताता है कि मीठे और विनम्र बोलों से ही सच्चा सुख मिलता है।
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