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ग़ज़ल

कबीर 141-150

کبیر 141-150
कबीर· Ghazal· 10 shers

कबीर के इन दोहों (141-150) में गहरा आध्यात्मिक ज्ञान निहित है। ये नकारात्मकता का जवाब खामोशी से देने की सलाह देते हैं, सांसारिक सुखों की क्षणभंगुरता को रेखांकित करते हैं और सभी के लिए मृत्यु की निश्चितता याद दिलाते हुए, जीवन में आत्म-जागरूकता और अपने वास्तविक उद्देश्य को समझने का आग्रह करते हैं।

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1
आवत गारी एक है , उलटन होय अनेककह कबीर नहिं उलटिये , वही एक की एक142
आने वाली गाड़ी एक है, पर उसका लौटना अनेक जैसा हो जाता है। शायर कबीर कहते हैं कि इसे उलटना नहीं चाहिए, क्योंकि एक ही वस्तु एक ही रहती है।
2
आहार करे मनभावता , इंद्री की स्वादनाक तलक पूरन भरे , तो कहिए कौन प्रसाद143
मनभावता (मन को मोहित करने वाली) आहार और इंद्रियों के स्वाद का आनंद लेती है। जब नाक (यानी इंद्रियाँ) स्वाद से पूरी तरह भर जाएं, तो आप बताइए कि वह आनंद क्या है।
3
आए हैं सो जाएँगे , राजा रंक फकीरएक सिंहासन चढ़ि चले , एक बाँधि जंजीर144
जो आए हैं वे चले जाएंगे, चाहे वे राजा हों, रंक हों या फकीर। एक सिंहासन पर बैठेगा, और एक जंजीरों से बंध जाएगा।
4
आया था किस काम को , तू सोया चादर तानसूरत सँभाल काफिला , अपना आप पह्चान145
तू किस काम से आया है, जबकि तू चादर ओढ़कर सोया हुआ है। ऐ काफिले, अपनी सूरत को संभालो और खुद को पहचानो।
5
उज्जवल पहरे कापड़ा , पान-सुपरी खायएक हरि के नाम बिन , बाँधा यमपुर जाय146
चमकीले वस्त्र और पान-सुपारी खाकर वे भोजन करते हैं। हरि (ईश्वर) के नाम के बिना, पूरा गाँव नष्ट हो जाएगा।
6
उतते कोई आवई , पासू पूछूँ धायइतने ही सब जात है , भार लदाय लदाय147
उतते कोई नहीं आता, मैं पासू से पूछती हूँ धाय। जीवन ऐसा ही है, बोझ उठाते हुए-उठाते हुए।
7
अवगुन कहूँ शराब का , आपा अहमक होयमानुष से पशुआ भया , दाम गाँठ से खोय148
शायर कहते हैं कि यह शराब का नशा है; आपका अहंकार बहुत अधिक है। मनुष्य पशु जैसा हो गया है और लालच के बंधन में खो गया है।
8
ऐसी वाणी बोलिए , मन का आपा खोएऔरन को शीतल करे , आपौ शीतल होय150
ऐसी वाणी बोलनी चाहिए, जिसमें अहंकार न हो। ऐसी वाणी दूसरों को शांति देती है और स्वयं को भी शीतलता प्रदान करती है।
9
कबीरा संगति साधु की , जौ की भूसी खायखीर खाँड़ भोजन मिले , ताकर संग जाय151
कबीरा कहते हैं कि साधु की संगति जो जौ की भूसी खाने वाले साधु के समान है, वह खीर और खाँड़ जैसे स्वादिष्ट भोजन से भी नहीं मिल सकती।
10
एक ते जान अनन्त , अन्य एक हो आयएक से परचे भया , एक बाहे समाय152
एक ही स्रोत से अनंत का ज्ञान होता है, और दूसरा एक इकाई बन जाता है। एक से सृष्टि प्रकट होती है, और दूसरे का निवास भी उसी में होता है।
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