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उतते कोई आवई , पासू पूछूँ धायइतने ही सब जात है , भार लदाय लदाय147

No one comes out, I ask the stray calf. Such is the whole life, carrying burden by burden.

कबीर
अर्थ

उतते कोई नहीं आता, मैं पासू से पूछती हूँ धाय। जीवन ऐसा ही है, बोझ उठाते हुए-उठाते हुए।

विस्तार

कबीर दास जी यहाँ कितनी गहरी बात कह रहे हैं! वे कहते हैं कि जहाँ हम सब जा रहे हैं, उस पार से कोई लौटकर नहीं आता हमें रास्ता बताने के लिए। हम सब बस चले ही जा रहे हैं, अपने जीवन के सारे बोझ, जिम्मेदारियां और इच्छाएं लादे हुए। यह दोहा हमें याद दिलाता है कि ज़िंदगी एकतरफ़ा सफ़र है जहाँ हर कोई अपने हिस्से का भार उठाकर चलता है।

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