ग़ज़ल

वज्द हो बुलबुल-ए-तस्वीर को जिस की बू से

وجد ہو بلبل تصویر کو جس کی بو سے
मीर अनीस· Ghazal· 5 shers· radif: से

यह ग़ज़ल महबूब के अलौकिक सौंदर्य और इश्क़ की बेपनाह तड़प को दर्शाती है। शायर का मानना है कि महबूब का हुस्न बेजान तस्वीर में भी जान फूँक सकता है, और प्रेमी के दिल की भयानक आग के आगे शम्अ के चंद आँसू बेहद मामूली हैं।

Source: rekhta · HI

गीत सुनें
लिपि व अर्थ
1
वज्द हो बुलबुल-ए-तस्वीर को जिस की बू से उस से गुल-रंग का दा'वा करे फिर किस रू से
जिसकी खुशबू से तस्वीर में बनी बेजान बुलबुल भी वज्द और मस्ती में आ जाए, भला कोई गुल-रंग किस मुँह से उसकी बराबरी का दावा कर सकता है।
2
शम्अ' के रोने पे बस साफ़ हँसी आती है आतिश-ए-दिल कहीं कम होती है चार आँसू से
मुझे शम्अ (मोमबत्ती) के रोने पर बस हँसी आती है, क्योंकि क्या दिल की आग कभी चंद आँसुओं से कम हो सकती है?
3
एक दिन वो था कि तकिया था किसी का बाज़ू अब सर उठता ही नहीं अपने सर-ए-ज़ानू से
एक समय ऐसा था जब किसी का बाज़ू मेरा तकिया हुआ करता था, लेकिन अब उदासी में मेरा सिर अपने ही घुटनों से नहीं उठता।
4
नज़्अ' में हूँ मिरी मुश्किल करो आसाँ यारों खोलो तावीज़-ए-शिफ़ा जल्द मिरे बाज़ू से
हे दोस्तो, मैं अंतिम सांसें ले रहा हूँ, मेरी मुश्किल आसान करो और मेरे बाज़ू से शिफ़ा (आरोग्य) का तावीज़ तुरंत खोल दो।
5
शोख़ी-ए-चश्म का तू किस की है दीवाना 'अनीस' आँखें मलता है जो यूँ नक़्श-ए-कफ़-ए-आहू से
ऐ अनीस, तू किसकी चंचल आँखों का ऐसा दीवाना हो गया है कि इस तरह हिरन के खुरों के निशानों से अपनी आँखें मल रहा है?
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