मुखड़े से उठाईं उन ने ज़ुल्फ़ें
जाना भी न हम गई किधर रात
“She lifted her tresses from her forehead; I neither knew where she went, nor where the night went.”
— मीर तक़ी मीर
अर्थ
उन्होंने अपने माथे से ज़ुल्फ़ें उठाईं; मैं यह भी नहीं जान पाई कि वह कहाँ गईं और रात कहाँ गई।
विस्तार
यह शेर उस पल की बात करता है जब महबूब के जादू में इंसान खुद को खो देता है। ज़ुल्फ़ों का मुखड़े से उठना, एक बहुत ही नज़दीकी, एक बहुत ही नाजुक लम्हा है। शायर कहते हैं कि न उन्हें पता कि वे कहाँ जा रहे हैं, और न ही पता कि रात किस तरफ जा रही है! यह वो बेचैनी है, वो मदहोशी है, जो इश्क़ में होती है।
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