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क्या दिन थे कि ख़ून था जिगर में रो उठते थे बैठ दोपहर रात

What days they were when blood flowed in the chest, Waking up and crying out in the afternoon and night.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

क्या दिन थे जब जिगर में खून बहता था, दोपहर और रात में बैठकर रोना उठना स्वाभाविक था।

विस्तार

यह शेर बीते हुए ज़माने के बहुत गहरे अहसास को बयां करता है। मिर्ज़ा तक़ी मीर कह रहे हैं कि वो दिन क्या थे, जब उनका दिल इतना भरा रहता था कि भावनाएं उबल पड़ती थीं। बस बैठे रहने से भी आँसू बह निकलते थे.... यह उस दर्द को बयान करता है, जो इतना गहरा हो कि उसे रोका न जा सके।

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