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दस्त-ए-सय्याद तलक भी मैं पहुँचा जीता बे-क़रारी ने लिया मुझ को तह-ए-दाम बहुत

Not even the touch of the master poet (Sayyad) was enough for me to reach; / For my restlessness (be-qarari) has taken me deeply into the abyss.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

मैं ज़िंदा होकर शायर सैयाद के स्पर्श तक भी नहीं पहुँच पाया; / मेरी बेचैनी ने मुझे बहुत गहरे गर्त में खींच लिया है।

विस्तार

इस शेर में शायर एक गहरे दर्द को बयां कर रहे हैं। वो कहते हैं कि मैं किसी बड़े संत या महबूब के करीब भी ज़िंदा नहीं पहुँच पाया। क्यों? क्योंकि मेरे अंदर की बेचैनी.... मेरे अंदर की बेक़रारी ने मुझे मौत की गहराइयों में खींच लिया। यह एहसास है कि कभी-कभी इंसान का सबसे बड़ा दुश्मन.... खुद की बेचैनी होती है।

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