ग़ज़ल

किस लिए फिरते हैं ये शम्स ओ क़मर दोनों साथ

کس لیے پھرتے ہیں یہ شمس و قمر دونوں ساتھ
नज़्म तबातबाई· Ghazal· 13 shers· radif: दोनों साथ

यह ग़ज़ल विरह, अस्तित्वगत व्याकुलता और मिलन की क्षणभंगुरता के गहरे दर्द को बयां करती है। सूर्य और चंद्रमा के अंतहीन भटकाव के रूपक के माध्यम से शायर ने विछोह के बाद दिल और कायनात दोनों के बुझ जाने की त्रासदी को भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
किस लिए फिरते हैं ये शम्स ओ क़मर दोनों साथ किस को ये ढूँडते हैं बरहना-सर दोनों साथ
यह सूरज और चाँद दोनों साथ-साथ किसलिए भटक रहे हैं? वे दोनों नंगे सिर होकर आखिर किसे ढूँढ रहे हैं?
2
कैसी या-रब ये हवा सुब्ह-ए-शब-ए-वस्ल चली बुझ गया दिल मिरा और शम-ए-सहर दोनों साथ
हे ईश्वर, मिलन की रात की सुबह यह कैसी हवा चली कि मेरा दिल और सुबह की शमा दोनों एक साथ बुझ गए।
3
ब'अद मेरे न रहा इश्क़ की मंज़िल का निशाँ मिट गए राह-रौ ओ राहगुज़र दोनों साथ
मेरे बाद इश्क़ की मंज़िल का कोई निशान बाकी न रहा; मुसाफ़िर और रास्ता दोनों एक साथ मिट गए।
4
ऐ जुनूँ देख इसी सहरा में अकेला हूँ मैं रहते जिस दश्त में हैं ख़ौफ़-ओ-ख़तर दोनों साथ
ऐ दीवानगी, देख कि मैं इस रेगिस्तान में बिल्कुल अकेला हूँ, उस वीराने में जहाँ डर और ख़तरा दोनों एक साथ रहते हैं।
5
मुझ को हैरत है शब-ए-ऐश की कोताही पर या ख़ुदा आए थे क्या शाम-ओ-सहर दोनों साथ
मुझे आनंद की रात के इतने छोटे होने पर बहुत हैरानी है; हे ईश्वर, क्या शाम और सुबह दोनों एक साथ आ गए थे?
6
उस ने फेरी निगह-ए-नाज़ ये मालूम हुआ खिंच गया सीने से तीर और जिगर दोनों साथ
जब उसने अपनी नाज़-भरी निगाहें फेरीं, तो ऐसा महसूस हुआ जैसे सीने से तीर और दिल दोनों एक साथ बाहर खिंच गए हों।
7
ग़म को दी दिल ने जगह दिल को जगह पहलू ने एक गोशे में करेंगे ये बसर दोनों साथ
दिल ने ग़म को अपने अंदर जगह दी और पहलू (सीने) ने दिल को पनाह दी; अब ये दोनों एक ही कोने में साथ रहकर अपनी ज़िंदगी बसर करेंगे।
8
इस को रोकूँ मैं इलाही कि सँभालूँ उस को कि तड़पने लगे दिल और जिगर दोनों साथ
हे ईश्वर, मैं किसे रोकूँ और किसे सँभालूँ, क्योंकि दिल और जिगर दोनों एक साथ तड़पने लगे हैं।
9
नाज़ बढ़ता गया बढ़ते गए जूँ जूँ गेसू बल्कि लेने लगे अब ज़ुल्फ़ ओ कमर दोनों साथ
जैसे-जैसे महबूब के बाल लंबे होते गए, वैसे-वैसे उसके नाज़-नख़रे भी बढ़ते गए; बल्कि अब तो उसकी ज़ुल्फ़ और कमर दोनों एक साथ चलने लगे हैं।
10
तुझ से मतलब है नहीं दुनिया ओ उक़्बा से ग़रज़ तू नहीं जब तो उजड़ जाएँ ये घर दोनों साथ
मुझे सिर्फ़ तुमसे मतलब है, इस दुनिया और परलोक (आख़िरत) से कोई सरोकार नहीं; अगर तुम ही नहीं हो, तो ये दोनों जहाँ एक साथ उजड़ जाएँ।
11
बात सुनना न किसी चाहने वाले की कभी कान में फूँक रहे हैं ये गुहर दोनों साथ
कानों में पहने ये दोनों मोती मिलकर कान में यह मंत्र फूँक रहे हैं कि कभी किसी चाहने वाले की बात मत सुनना।
12
आँधियाँ आह की भी अश्क का सैलाब भी है देते हैं दिल की ख़राबी की ख़बर दोनों साथ
यहाँ आहों की आँधियाँ भी हैं और आँसुओं का सैलाब भी है। ये दोनों मिलकर दिल की बर्बादी और ख़राब हालत की ख़बर देते हैं।
13
क्या कहूँ ज़ोहरा ओ ख़ुर्शीद का आलम ऐ 'नज़्म' निकले ख़ल्वत से जूँही वक़्त-ए-सहर दोनों साथ
ऐ 'नज़्म', मैं ज़ोहरा (शुक्र) और ख़ुर्शीद (सूर्य) की क्या दशा बयान करूँ, जब वे दोनों सुबह के वक़्त अपने एकांत कक्ष से एक साथ बाहर निकले।
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