“Let someone listen with an ear of warning to this cry of mine; I am the blood-singing nightingale of the garden of Lucknow.”
कोई मेरी इस फ़रियाद को सबक़ लेने वाले (इबरत के) कानों से सुने, क्योंकि मैं लखनऊ के बाग़ का ख़ून भरी आवाज़ में विलाप करने वाला बुलबुल हूँ।
इस शे’र में शायर उजड़ चुके लखनऊ की पुरानी शान-ओ-शौकत का मातम मनाते हुए अपनी आवाज़ को एक दर्दनाक दास्तान की तरह पेश करता है। वह खुद को लखनऊ रूपी बाग़ की ऐसी बुलबुल बताता है जिसके गीतों में अब रस नहीं, बल्कि ख़ून और आँसू घुले हैं। वह दुनिया से गुज़ारिश करता है कि उसकी इस पुकार को महज़ शायरी समझकर न सुना जाए, बल्कि वक़्त के बेरहम ज़वाल और इतिहास से सबक़ लेने वाले दिल से सुना जाए।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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