“আনন্দে দুঃখে মেলামেশায়, তোমার স্পর্শ পাই হে, সুখের দিনে তোমায় ভুলি, দুখের দিনে ডাকি তোমায়॥”
आनंद और दुख के मेल में, मैं तुम्हारा स्पर्श पाता हूँ। सुख के दिनों में तुम्हें भूल जाता हूँ, पर दुख के दिनों में तुम्हें पुकारता हूँ।
यह सुंदर दोहा हमारी मानवीय प्रवृत्ति और ईश्वर की निरंतर उपस्थिति को दर्शाता है। यह कहता है कि चाहे हम खुशी में हों या दुख में, जीवन के हर अनुभव में हम एक दिव्य स्पर्श महसूस कर सकते हैं। हालांकि, यह हमारी एक आम आदत को भी उजागर करता है: जब हमारे दिन खुशी और आराम से भरे होते हैं, तो हम अक्सर इस ईश्वरीय संबंध को भूल जाते हैं। आमतौर पर, जब कठिनाइयाँ या दुख आते हैं, तभी हमें उस परम शक्ति की याद आती है और हम उसे पुकारते हैं। यह दोहा हमें धीरे से याद दिलाता है कि वह उपस्थिति हमेशा हमारे साथ है, चाहे हम उसे अपने अच्छे समय में स्वीकार करें या केवल अपनी मुश्किलों में याद करें।
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