ग़ज़ल

मत ग़ुस्से के शो'ले सूँ जलते कूँ जलाती जा

مت غصہ کے شعلے سوں جلتے کوں جلاتی جا
वली दकनी· Ghazal· 8 shers· radif: जा

यह ग़ज़ल प्रेम, विरह और मनुहार के भावों से ओत-प्रोत है। इसमें आशिक़ अपनी नटखट और गर्वीली महबूबा से गुज़ारिश करता है कि वह ग़ुस्से की आग भड़काने के बजाय मेहरबानी और मुहब्बत का इज़हार करे।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
मत ग़ुस्से के शो'ले सूँ जलते कूँ जलाती जा टुक मेहर के पानी सूँ तू आग बुझाती जा
अपने ग़ुस्से की आग से पहले से जलते हुए को और मत जलाओ, बल्कि अपनी थोड़ी सी दया और मेहरबानी के पानी से इस आग को बुझाती जाओ।
2
तुझ चाल की क़ीमत सूँ दिल नीं है मिरा वाक़िफ़ ऐ मान भरी चंचल टुक भाव बताती जा
मेरा दिल तुम्हारी खूबसूरत चाल की क़ीमत से वाक़िफ़ नहीं है; ऐ नाज़-ओ-अंदाज़ वाली शोख़ माशूक़ा, ज़रा इसकी क़ीमत तो बताती जाओ।
3
इस रात अँधारी में मत भूल पड़ूँ तुझ सूँ टुक पाँव के झाँझर की झंकार सुनाती जा
इस अंधेरी रात में कहीं मैं रास्ता भूलकर तुमसे बिछड़ न जाऊँ, इसलिए चलते हुए ज़रा अपने पाँव की पाज़ेब की झंकार सुनाती जाओ।
4
मुझ दिल के कबूतर कूँ बाँधा है तिरी लट ने ये काम धरम का है टुक उस को छुड़ाती जा
तुम्हारी लट ने मेरे दिल के कबूतर को बाँध लिया है; यह भलाई और धर्म का काम है, इसलिए जाते हुए ज़रा इसे आज़ाद करती जाओ।
5
तुझ मुख की परस्तिश में गई उम्र मिरी सारी ऐ बुत की पुजनहारी टुक उस को पुजाती जा
मेरी पूरी उम्र तुम्हारे चेहरे की पूजा करने में बीत गई। ऐ मूर्तियों की पूजा करने वाली, ज़रा ठहर और इसे भी पूजती जा।
6
तुझ इश्क़ में जल जल कर सब तन कूँ किया काजल ये रौशनी अफ़ज़ा है अँखिया को लगाती जा
तुम्हारे इश्क़ में जल-जल कर मैंने अपने पूरे शरीर को काजल बना लिया है। यह आँखों की रौशनी बढ़ाने वाला है, इसलिए इसे अपनी आँखों में लगाती जाओ।
7
तुझ नेह में दिल जल जल जोगी की लिया सूरत यक बार उसे मोहन छाती सूँ लगाती जा
तुम्हारे प्रेम में जल-जलकर मेरा दिल जोगी का रूप धारण कर चुका है, हे मनमोहन! कम से कम एक बार तो इसे अपने सीने से लगा लो।
8
तुझ घर की तरफ़ सुंदर आता है 'वली' दाएम मुश्ताक़ दरस का है टुक दर्स दिखाती जा
हे सुंदरी, 'वली' हमेशा तुम्हारे घर की तरफ़ आता रहता है। वह तुम्हारे दर्शन का इच्छुक है, इसलिए उसे बस एक पल के लिए अपनी एक झलक दिखाती जाओ।
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