“It bestows sweet delight upon Wali’s tongue—to speak, each dawn and dusk, of your lips.”
सुबह और शाम तुम्हारे होंठों की चर्चा करना 'वली' की ज़बान को बेहद लज़्ज़त और मिठास देता है।
वली यहाँ बड़े प्यार से कहते हैं कि महबूब के नाज़ुक होठों की चर्चा करना ही उनकी ज़ुबान को एक अनोखी मिठास और लज़्ज़त दे जाता है। सुबह और शाम का ज़िक्र यह बताता है कि आशिक़ के लिए महबूब का ख़याल किसी ख़ास वक़्त का मोहताज नहीं, बल्कि दिन-रात की एक मुसलसल इबादत जैसा है। लफ़्ज़ों में यह ख़ूबसूरत अहसास पिरोया गया है कि सिर्फ़ महबूब का ज़िक्र छेड़ने भर से ही ज़ुबान और रूह दोनों तर-ओ-ताज़ा हो उठते हैं।
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