“From the gathering of friends the spring breeze turned back in despair; not a single head was found ready for the madness of love.”
दोस्तों की महफ़िल से बहार की हवा निराश होकर लौट गई, क्योंकि उसे वहाँ एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जो इश्क़ के दीवानेपन या जुनून के लिए तैयार हो।
उर्दू शायरी में वसंत की हवा यानी 'बाद-ए-बहारी' सिर्फ़ मौसम नहीं, बल्कि इश्क़ और दीवानगी को जगाने वाली ताज़ा उम्मीद है। शायर बड़े अफ़सोस से कहते हैं कि जब यह मदहोश हवा दोस्तों की महफ़िल में पहुँची, तो मायूस होकर लौट गई। वहाँ मौजूद सब लोग दुनियादारी और अक़्लमंदी में इतने घिर चुके थे कि किसी के भीतर भी इश्क़ के जूनून में बेपरवाह हो जाने का हौसला बाक़ी नहीं था।
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