ग़ज़ल
दिल मिरा जिस से बहलता कोई ऐसा न मिला
دل مرا جس سے بہلتا کوئی ایسا نہ ملا
यह ग़ज़ल गहरे अकेलेपन और सांसारिक खोखलेपन की व्यथा को व्यक्त करती है। शायर इस बात से निराश है कि उसे मन को बहलाने वाला कोई सच्चा हमदर्द या ईश्वर का सच्चा बंदा नहीं मिला, बल्कि हर ओर केवल सतहीपन ही दिखाई देता है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
दिल मिरा जिस से बहलता कोई ऐसा न मिला
बुत के बंदे मिले अल्लाह का बंदा न मिला
मुझे ऐसा कोई न मिला जिससे मेरा दिल बहल सके; बुतों के पुजारी तो बहुत मिले, लेकिन ईश्वर का कोई सच्चा बंदा नहीं मिला।
2
बज़्म-ए-याराँ से फिरी बाद-ए-बहारी मायूस
एक सर भी उसे आमादा-ए-सौदा न मिला
दोस्तों की महफ़िल से बहार की हवा निराश होकर लौट गई, क्योंकि उसे वहाँ एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जो इश्क़ के दीवानेपन या जुनून के लिए तैयार हो।
3
गुल के ख़्वाहाँ तो नज़र आए बहुत इत्र-फ़रोश
तालिब-ए-ज़मज़मा-ए-बुलबुल-ए-शैदा न मिला
फूल चाहने वाले बहुत से इत्र बेचने वाले तो दिखाई दिए, लेकिन दीवाने बुलबुल के गीतों का कोई चाहने वाला नहीं मिला।
4
वाह क्या राह दिखाई है हमें मुर्शिद ने
कर दिया काबे को गुम और कलीसा न मिला
हमारे मुर्शिद ने हमें ऐसा रास्ता दिखाया कि हम काबे की राह भी भूल गए और हमें गिरजाघर भी नहीं मिला।
5
रंग चेहरे का तो कॉलेज ने भी रक्खा क़ाइम
रंग-ए-बातिन में मगर बाप से बेटा न मिला
कॉलेज ने बेटे के चेहरे का बाहरी रंग-रूप तो बनाए रखा, लेकिन आंतरिक स्वभाव और चरित्र में वह अपने पिता से मेल नहीं खा सका।
6
सय्यद उट्ठे जो गज़ट ले के तो लाखों लाए
शैख़ क़ुरआन दिखाते फिरे पैसा न मिला
जब सय्यद सरकारी गज़ट लेकर निकले तो लाखों रुपये जमा कर लाए, जबकि शैख़ क़ुरआन दिखाते फिरे मगर उन्हें एक पैसा भी नहीं मिला।
7
होशयारों में तो इक इक से सिवा हैं 'अकबर'
मुझ को दीवानों में लेकिन कोई तुझ सा न मिला
ऐ अकबर, समझदार और अक्लमंद लोगों में तो एक से बढ़कर एक मौजूद हैं, लेकिन दीवानों में मुझे तेरे जैसा कोई नहीं मिला।
Comments · 0
Free — just your email. You'll come right back here.
No comments yet. Be the first.
