“Ah, what a path my spiritual guide has shown to me: I lost the way to the Kaaba, yet no church could be found.”
हमारे मुर्शिद ने हमें ऐसा रास्ता दिखाया कि हम काबे की राह भी भूल गए और हमें गिरजाघर भी नहीं मिला।
इस शेर में बहुत मीठा सा तंज़ और लाचारी का गहरा दर्द छिपा है। शायर अपने मुर्शिद यानी मार्गदर्शक पर व्यंग्य करते हुए कहता है कि उन्होंने हमें ऐसा रास्ता दिखाया कि हम न घर के रहे, न घाट के। हमारी पुरानी आस्था और यकीन (काबा) तो छूट ही गया, और जिस नए सुकून या मंज़िल (कलीसा) की उम्मीद थी, वह भी न मिली। यह शेर उस भटकाव की दास्तान है जहाँ इंसान किसी के वादों के फेर में पड़कर अपना सब कुछ गंवा बैठता है।
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