फ़लसफ़ी को बहस के अंदर ख़ुदा मिलता नहीं डोर को सुलझा रहा है और सिरा मिलता नहीं

“The philosopher finds no God in argument and debate; he seeks to untangle the thread, but cannot find its end.”

— अकबर इलाहाबादी
अर्थ

दार्शनिक को बहस और तर्क-वितर्क में ईश्वर नहीं मिलता। वह मानो धागे की उलझन को सुलझाने में लगा है लेकिन उसे उसका सिरा नहीं मिल पा रहा।

विस्तार

इस शेर में शायर अक्ल और तर्क की सीमाओं पर बड़ी सादगी से मुस्कुराता है। वह एक खूबसूरत मिसाल देता है कि दलीलों में उलझा दार्शनिक उस इंसान जैसा है, जो धागे की गुत्थी सुलझाने की कोशिश तो कर रहा है पर उसे सिरा ही नहीं मिल रहा। ईश्वर या परम सत्य को सूखी बहसों से नहीं, बल्कि दिल के अहसास और समर्पण से महसूस किया जा सकता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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