मा'रिफ़त ख़ालिक़ की आलम में बहुत दुश्वार है शहर-ए-तन में जब कि ख़ुद अपना पता मिलता नहीं

“To know the Creator in this world is an arduous, elusive quest, / When even in the city of the body, one cannot find one's own trace.”

— अकबर इलाहाबादी
अर्थ

इस दुनिया में सृष्टिकर्ता (ख़ालिक़) को पहचानना बहुत कठिन है, जब इंसान को अपने ही शरीर के भीतर अपनी ख़ुद की पहचान या पता नहीं मिलता।

विस्तार

शायर यहाँ रूहानी तलाश की एक गहरी बात बहुत सादगी से समझाते हैं। वे हमारे वजूद और जिस्म को एक शहर (शहर-ए-तन) कहते हैं, जिसमें हम खुद अपनी ही हक़ीक़त से बेखबर और भटके हुए हैं। जब इंसान खुद अपने दिल और रूह को नहीं पहचान पाता, तो फिर उस बेइंतहा ख़ालिक़ यानी खुदा को पूरी कायनात में तलाशना और समझना भला कैसे मुमकिन हो सकता है!

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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