मा'नी-ए-दिल का करे इज़हार 'अकबर' किस तरह लफ़्ज़ मौज़ूँ बहर-ए-कश्फ़-ए-मुद्दआ मिलता नहीं

“How can Akbar give voice to the unspoken meanings of the heart, when no fitting word is found to unveil the soul's desire?”

— अकबर इलाहाबादी
अर्थ

'अकबर' दिल के भावों का इज़हार किस तरह करे, क्योंकि अपने दिल की बात या मक़सद को ज़ाहिर करने के लिए कोई उपयुक्त शब्द ही नहीं मिलता।

विस्तार

इस शेर में अकबर इलाहाबादी दिल के उन गहरे जज़्बातों की बात कर रहे हैं, जिन्हें ज़बान पर लाना नामुमकिन सा लगता है। वे कहते हैं कि दिल के भीतर जो गूढ़ भाव और अहसास उमड़ते हैं, उन्हें बयां करने के लिए दुनिया की कोई भी भाषा पूरी नहीं पड़ती। इंसान अपनी बात तो कहना चाहता है, मगर जज़्बातों की गहराई इतनी ज़्यादा होती है कि लफ़्ज़ कमज़ोर पड़ जाते हैं और दिल की बात अधूरी रह जाती है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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