ना-तजरबा-कारी से वाइ'ज़ की ये हैं बातें इस रंग को क्या जाने पूछो तो कभी पी है

“These sermons of the preacher stem purely from his naivety; What could he know of this ecstasy—ask him, has he ever tasted wine?”

— अकबर इलाहाबादी
अर्थ

उपदेशक (वाइज़) की ये बातें सिर्फ उसकी अनुभवहीनता की वजह से हैं। वह इस मस्ती के रंग को क्या समझे, ज़रा उससे पूछो तो सही कि क्या उसने कभी शराब पी भी है?

विस्तार

शायर यहाँ धर्मोपदेशक (वाइज़) की नसीहतों पर प्यार भरी चुटकी लेते हुए कह रहा है कि जो चीज़ उसने खुद कभी महसूस नहीं की, उस पर वह राय कैसे दे सकता है। उर्दू शायरी में 'शराब' केवल नशा नहीं, बल्कि इश्क़ की बेख़ुदी, सच्चाई और रूहानी मस्ती का प्रतीक है। जिसने इस रंग को कभी चखा ही न हो, वह भला इसके गहरे आनंद को क्या जाने? असल बात यह है कि ज़िंदगी और मुहब्बत का फलसफ़ा किताबों से नहीं, दिल के तजुर्बे से समझा जाता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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