ग़ज़ल

हंगामा है क्यूँ बरपा थोड़ी सी जो पी ली है

ہنگامہ ہے کیوں برپا تھوڑی سی جو پی لی ہے
अकबर इलाहाबादी· Ghazal· 9 shers· radif: है

यह ग़ज़ल चुलबुले और व्यंग्यात्मक लहजे में समाज के दोहरे मापदंडों और उपदेशक के खोखले ज्ञान पर कटाक्ष करती है। शायर रिंदाना बेबाकी से शराब पीने को एक निर्दोष आनंद बताते हुए यह तर्क देता है कि जिसने इस रंग का कभी अनुभव ही नहीं किया, वह इसकी हक़ीक़त पर सवाल उठाने का कोई हक़ नहीं रखता।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
हंगामा है क्यूँ बरपा थोड़ी सी जो पी ली है डाका तो नहीं मारा चोरी तो नहीं की है
अगर थोड़ी सी शराब पी ही ली है तो इतना हंगामा क्यों मचा हुआ है? मैंने कोई डाका तो नहीं डाला और न ही कोई चोरी की है।
2
ना-तजरबा-कारी से वाइ'ज़ की ये हैं बातें इस रंग को क्या जाने पूछो तो कभी पी है
उपदेशक (वाइज़) की ये बातें सिर्फ उसकी अनुभवहीनता की वजह से हैं। वह इस मस्ती के रंग को क्या समझे, ज़रा उससे पूछो तो सही कि क्या उसने कभी शराब पी भी है?
3
उस मय से नहीं मतलब दिल जिस से है बेगाना मक़्सूद है उस मय से दिल ही में जो खिंचती है
मुझे उस शराब से कोई सरोकार नहीं जिससे दिल बेगाना रहे, मेरा मक़सद केवल उस शराब से है जो दिल के अंदर ही तैयार होती है।
4
ऐ शौक़ वही मय पी ऐ होश ज़रा सो जा मेहमान-ए-नज़र इस दम एक बर्क़-ए-तजल्ली है
ऐ चाहत, तू वही शराब पी ले और ऐ होश, तू ज़रा सो जा; क्योंकि इस समय मेरी नज़रों की मेहमान ईश्वरीय प्रकाश की एक कौंधती बिजली है।
5
वाँ दिल में कि सदमे दो याँ जी में कि सब सह लो उन का भी अजब दिल है मेरा भी अजब जी है
वहाँ उनके दिल में यह बात है कि दर्द और सदमे पहुँचाएँ, जबकि यहाँ मेरे दिल में यह है कि सब कुछ चुपचाप सह लें; उनका दिल भी कितना अनोखा है और मेरा दिल भी कितना अजीब है।
6
हर ज़र्रा चमकता है अनवार-ए-इलाही से हर साँस ये कहती है हम हैं तो ख़ुदा भी है
सृष्टि का हर कण ईश्वर के नूर से चमक रहा है, और हर साँस यह कहती है कि यदि हम हैं तो ईश्वर भी अवश्य है।
7
सूरज में लगे धब्बा फ़ितरत के करिश्मे हैं बुत हम को कहें काफ़िर अल्लाह की मर्ज़ी है
सूरज पर धब्बा लगना कुदरत का करिश्मा है, और अगर बुत (या माशूक) हमें काफ़िर कहें तो यह अल्लाह की मर्ज़ी है।
8
तालीम का शोर ऐसा तहज़ीब का ग़ुल इतना बरकत जो नहीं होती निय्यत की ख़राबी है
शिक्षा और तहज़ीब का इतना अधिक शोर और दिखावा है, लेकिन फिर भी यदि कोई बरकत नहीं हो रही है तो यह केवल नीयत की खराबी की वजह से है।
9
सच कहते हैं शैख़ 'अकबर' है ताअत-ए-हक़ लाज़िम हाँ तर्क-ए-मय-ओ-शाहिद ये उन की बुज़ुर्गी है
ऐ अकबर, शेख बिल्कुल सच कहते हैं कि ईश्वर की आज्ञा का पालन करना ज़रूरी है। लेकिन शराब और महबूब दोनों को छोड़ देना, यह केवल उनका ही बड़प्पन और संयम है।
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