सुर कहाँ के साज़ कैसा कैसी बज़्म-ए-सामईन जोश-ए-दिल काफ़ी है 'अकबर' तान उड़ाने के लिए

“What need of melody or lute, what gathering of listeners all around? / The heart's own fervor is enough, Akbar, to lift a soaring sound.”

— अकबर इलाहाबादी
अर्थ

न सुरों की आवश्यकता है, न बाजे की और न ही सुनने वालों की महफ़िल की; ऐ 'अकबर', ऊँची तान छेड़ने के लिए दिल का जोश ही काफ़ी है।

विस्तार

अकबर इलाहाबादी इस शेर में कहते हैं कि अपनी आवाज़ उठाने या गाने के लिए किसी साज़, सही सुर या सुनने वालों की महफ़िल की कोई ज़रूरत नहीं होती। जब दिल में सच्चा जज़्बा और आग हो, तो वह अंदरूनी जोश ही इंसान को बेबाक उड़ान भरने और दिल खोलकर गाने की ताकत दे देता है। यह शेर साफ़ करता है कि सच्ची कला और दिली अभिव्यक्ति किसी बाहरी साधन या वाहवाही की मोहताज नहीं होती।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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