ग़ज़ल
हर क़दम कहता है तू आया है जाने के लिए
ہر قدم کہتا ہے تو آیا ہے جانے کے لیے
यह ग़ज़ल मानव जीवन की नश्वरता और इस संसार की क्षणभंगुरता पर गहराई से विचार करती है, जहाँ हर क़दम मनुष्य को उसकी अंतिम विदाई की याद दिलाता है। एक उदास और दार्शनिक भाव में शायर यह संदेश देता है कि यह अस्थिर दुनिया दिल लगाने की जगह नहीं बल्कि केवल एक अस्थायी पड़ाव है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
हर क़दम कहता है तू आया है जाने के लिए
मंज़िल-ए-हस्ती नहीं है दिल लगाने के लिए
हर क़दम यही याद दिलाता है कि इंसान इस दुनिया में सिर्फ़ जाने के लिए आया है, और यह ज़िंदगी दिल लगाने का ठिकाना नहीं है।
2
क्या मुझे ख़ुश आए ये हैरत-सरा-ए-बे-सबात
होश उड़ने के लिए है जान जाने के लिए
यह अस्थिर और हैरान करने वाला संसार मुझे कैसे पसंद आ सकता है, जहाँ होश केवल खो जाने के लिए और जान केवल चले जाने के लिए है।
3
दिल ने देखा है बिसात-ए-क़ुव्वत-ए-इदराक को
क्या बढ़े इस बज़्म में आँखें उठाने के लिए
दिल ने समझने-बूझने की क्षमता की सीमा को भली-भाँति देख लिया है, इसलिए वह इस महफ़िल में नज़रें उठाने का साहस करके आगे कैसे बढ़ सकता है?
4
ख़ूब उम्मीदें बंधीं लेकिन हुईं हिरमाँ नसीब
बदलियाँ उट्ठीं मगर बिजली गिराने के लिए
बहुत सी उम्मीदें बंधी थीं लेकिन अंत में केवल निराशा ही नसीब हुई; बादल भी छाए, मगर सिर्फ़ बिजली गिराने के लिए।
5
साँस की तरकीब पर मिट्टी को प्यार आ ही गया
ख़ुद हुई क़ैद उस को सीने से लगाने के लिए
मिट्टी को साँस लेने के हुनर या तरकीब से प्यार हो गया, और उसने साँस को अपने सीने से लगाने के लिए खुद को ही क़ैद कर लिया।
6
जब कहा मैं ने भुला दो ग़ैर को हँस कर कहा
याद फिर मुझ को दिलाना भूल जाने के लिए
जब मैंने उससे कहा कि ग़ैर को भुला दो, तो उसने हँसते हुए कहा कि उसे भुलाने के लिए मुझे फिर से उसकी याद दिलाना।
7
दीदा-बाज़ी वो कहाँ आँखें रहा करती हैं बंद
जान ही बाक़ी नहीं अब दिल लगाने के लिए
अब नज़रें मिलाने का वह शौक कहाँ रहा, आँखें तो बंद ही रहती हैं। दिल लगाने के लिए अब जान ही बाकी नहीं बची है।
8
मुझ को ख़ुश आई है मस्ती शैख़ जी को फ़रबही
मैं हूँ पीने के लिए और वो हैं खाने के लिए
मुझे नशे की मस्ती पसंद आई है और शेख़ जी को मोटा होना; मैं शराब पीने के लिए हूँ और वे भरपेट खाने के लिए हैं।
9
अल्लाह अल्लाह के सिवा आख़िर रहा कुछ भी न याद
जो किया था याद सब था भूल जाने के लिए
आखिरकार अल्लाह के नाम के सिवा कुछ भी याद नहीं रहा। जो कुछ भी पहले याद किया था, वह सब केवल भूल जाने के लिए ही था।
10
सुर कहाँ के साज़ कैसा कैसी बज़्म-ए-सामईन
जोश-ए-दिल काफ़ी है 'अकबर' तान उड़ाने के लिए
न सुरों की आवश्यकता है, न बाजे की और न ही सुनने वालों की महफ़िल की; ऐ 'अकबर', ऊँची तान छेड़ने के लिए दिल का जोश ही काफ़ी है।
Comments · 0
Free — just your email. You'll come right back here.
No comments yet. Be the first.
