“Save for 'God, O God!', in the end naught remained in mind; all that had been learned by heart was only to be left behind.”
आखिरकार अल्लाह के नाम के सिवा कुछ भी याद नहीं रहा। जो कुछ भी पहले याद किया था, वह सब केवल भूल जाने के लिए ही था।
यह शेर ज़िंदगी के उस आख़िरी मोड़ और रूहानी सच्चाई को बयान करता है, जहाँ पहुँचकर दुनिया की सारी भाग-दौड़ बेमानी लगने लगती है। इंसान उम्र भर जो इल्म, रिश्ते और यादें सँजो कर रखता है, वे सब दरअसल वक़्ती थीं और उन्हें एक दिन छूट ही जाना था। जब जीवन की असली हक़ीक़त सामने आती है, तो दुनिया का हर शोर ख़ामोश हो जाता है और दिल पर सिर्फ़ अपने ख़ालिक़ का नाम, यानी 'अल्लाह अल्लाह' ही बाक़ी रह जाता है।
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