देखिए होती है कब राही सू-ए-मुल्क-ए-अदम ख़ाना-ए-तन से हमारी रूह घबराई तो है

“Let us see when it departs for the realm of non-existence; weary of this house of flesh, my soul has grown restless indeed.”

— अकबर इलाहाबादी
अर्थ

देखिए हमारी रूह कब मृत्यु (अदम) के देश की ओर रवाना होती है, क्योंकि वह इस शरीर रूपी घर से परेशान और घबरा तो चुकी है।

विस्तार

इस शेर में शायर ने इंसानी जिस्म को एक ऐसे तंग मकान की तरह देखा है, जिसमें रूह अब घुटने लगी है और बेचैन हो चुकी है। ज़िंदगी के बोझ और तकलीफ़ों से थककर आत्मा अब 'मुल्क-ए-अदम' यानी उस ख़ामोश और असीम दुनिया की तरफ़ रुख़सत होने को बेताब है। यहाँ मौत को किसी ख़ौफ़ के तौर पर नहीं, बल्कि एक थके हुए मुसाफ़िर की सुकून और आज़ादी की तलाश के रूप में देखा गया है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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