“Let us see when it departs for the realm of non-existence; weary of this house of flesh, my soul has grown restless indeed.”
देखिए हमारी रूह कब मृत्यु (अदम) के देश की ओर रवाना होती है, क्योंकि वह इस शरीर रूपी घर से परेशान और घबरा तो चुकी है।
इस शेर में शायर ने इंसानी जिस्म को एक ऐसे तंग मकान की तरह देखा है, जिसमें रूह अब घुटने लगी है और बेचैन हो चुकी है। ज़िंदगी के बोझ और तकलीफ़ों से थककर आत्मा अब 'मुल्क-ए-अदम' यानी उस ख़ामोश और असीम दुनिया की तरफ़ रुख़सत होने को बेताब है। यहाँ मौत को किसी ख़ौफ़ के तौर पर नहीं, बल्कि एक थके हुए मुसाफ़िर की सुकून और आज़ादी की तलाश के रूप में देखा गया है।
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