ग़ज़ल

जज़्बा-ए-दिल ने मिरे तासीर दिखलाई तो है

جذبۂ دل نے مرے تاثیر دکھلائی تو ہے
अकबर इलाहाबादी· Ghazal· 12 shers· radif: तो है

यह ग़ज़ल सच्चे प्रेम के असर और प्रियतम की आमद की उम्मीद को बयां करती है। यद्यपि प्रेम के इज़हार में बदनामी का ख़तरा हमेशा रहता है, फिर भी शायर दिल की बेबसी और समर्पण को पूरी शिद्दत से स्वीकार करता है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
जज़्बा-ए-दिल ने मिरे तासीर दिखलाई तो है घुंघरूओं की जानिब-ए-दर कुछ सदा आई तो है
मेरे दिल के जज़्बे ने आख़िरकार अपना असर दिखाया तो है, दरवाज़े की तरफ़ से घुंघरुओं की कुछ आवाज़ सुनाई तो दी है।
2
इश्क़ के इज़हार में हर-चंद रुस्वाई तो है पर करूँ क्या अब तबीअत आप पर आई तो है
हालाँकि प्यार का इज़हार करने में बदनामी तो ज़रूर है, लेकिन मैं क्या करूँ जब मेरा दिल आप पर आ ही गया है।
3
आप के सर की क़सम मेरे सिवा कोई नहीं बे-तकल्लुफ़ आइए कमरे में तन्हाई तो है
मुझे आपके सिर की कसम है कि मेरे अलावा यहाँ कोई नहीं है। आप बिना किसी संकोच के अंदर आ जाइए, कम से कम कमरे में एकांत तो है।
4
जब कहा मैं ने तड़पता है बहुत अब दिल मिरा हंस के फ़रमाया तड़पता होगा सौदाई तो है
जब मैंने कहा कि अब मेरा दिल बहुत तड़प रहा है, तो उन्होंने हँसकर कहा कि तड़पता ही होगा, आख़िरकार वह दीवाना जो है।
5
देखिए होती है कब राही सू-ए-मुल्क-ए-अदम ख़ाना-ए-तन से हमारी रूह घबराई तो है
देखिए हमारी रूह कब मृत्यु (अदम) के देश की ओर रवाना होती है, क्योंकि वह इस शरीर रूपी घर से परेशान और घबरा तो चुकी है।
6
दिल धड़कता है मिरा लूँ बोसा-ए-रुख़ या न लूँ नींद में उस ने दुलाई मुँह से सरकाई तो है
मेरा दिल धड़क रहा है कि उसके गाल को चूमूँ या न चूमूँ, उसने नींद में अपने चेहरे से लिहाफ़ हटा तो दिया है।
7
देखिए लब तक नहीं आती गुल-ए-आरिज़ की याद सैर-ए-गुलशन से तबीअ'त हम ने बहलाई तो है
देखना है कि अब उस गुलाब जैसे गालों वाले महबूब की याद होठों तक आती है या नहीं; हमने बाग़ की सैर करके अपना दिल बहलाने की कोशिश तो की है।
8
मैं बला में क्यूँ फँसूँ दीवाना बन कर उस के साथ दिल को वहशत हो तो हो कम्बख़्त सौदाई तो है
मैं उसके साथ दीवाना बनकर किसी मुसीबत में क्यों फँसूँ? अगर दिल को वहशत या बेचैनी होती है तो हो, कमबख्त यह तो पहले से ही पागल है।
9
ख़ाक में दिल को मिलाया जल्वा-ए-रफ़्तार से क्यूँ न हो ऐ नौजवाँ इक शान-ए-रानाई तो है
तुमने अपनी दिलकश चाल से मेरे दिल को मिट्टी में मिला दिया। हे नौजवान, ऐसा भला क्यों न हो, आख़िर तुम्हारे हुस्न और नाज़-ओ-अदा की भी एक अलग शान है।
10
यूँ मुरव्वत से तुम्हारे सामने चुप हो रहें कल के जलसों की मगर हम ने ख़बर पाई तो है
हालाँकि हम लिहाज़ और शराफ़त के कारण आपके सामने चुप रहते हैं, लेकिन कल की महफ़िलों की ख़बर तो हमें मिल ही चुकी है।
11
बादा-ए-गुल-रंग का साग़र इनायत कर मुझे साक़िया ताख़ीर क्या है अब घटा छाई तो है
मुझे गुलाबी रंग की शराब का प्याला प्रदान करो। ऐ साक़ी, अब किस बात की देर है जब आसमान में घटा छा चुकी है।
12
जिस की उल्फ़त पर बड़ा दावा था कल 'अकबर' तुम्हें आज हम जा कर उसे देख आए हरजाई तो है
ऐ अकबर, कल तुम्हें जिसके प्रेम पर बड़ा दावा था, आज हम खुद जाकर उसे देख आए हैं और वह सचमुच बेवफ़ा ही है।
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