“Again and again the stage for union was set, yet came to naught; the dark clouds gathered thick and deep, but never fell the rain.”
मिलन की तैयारियाँ बार-बार होकर भी अधूरी रह गईं; घटाएँ तो बहुत छाईं लेकिन बारिश कभी नहीं बरसी।
यह शेर उम्मीद के बंधने और फिर अचानक टूट जाने की टीस को बहुत सादगी से बयां करता है। शायर महबूब से मिलन की उन तमाम तैयारियों का ज़िक्र करता है जो मुकम्मल होते-होते रह गईं, ठीक वैसे ही जैसे आसमान में घटाएं तो खूब उमड़कर आईं पर बारिश की एक बूंद भी न बरसी। इसमें उस अधूरेपन का दर्द है जहाँ दिल हर बार वस्ल की उम्मीद से भर जाता है, मगर आखिर में सिर्फ खालीपन हाथ लगता है।
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