“Enough now of detailing the weary trials of the road; / Tell me, O messenger, where is the reply to my letter?”
रास्ते की थकान और परेशानियों का ज़िक्र अब बहुत हो चुका, ऐ संदेशवाहक (नामाबर), मुझे यह बताओ कि मेरे ख़त का जवाब कहाँ है?
ज़रा उस आशिक़ की तड़प देखिए, जो महबूब के एक पैग़ाम के लिए पल-पल गिन रहा था। जब नामाबर (संदेशवाहक) लौटकर ख़त का जवाब देने के बजाय रास्ते की मुश्किलों और अपनी थकान का रोना रोता है, तो आशिक़ का सब्र जवाब दे जाता है। इस शेर में गहरी बेचैनी के साथ एक छुपा हुआ डर भी है—कि कहीं क़ासिद की यह लंबी-चौड़ी बातें महबूब की बेरुख़ी या ख़ाली हाथ लौटने की सच्चाई को टालने का बहाना तो नहीं हैं?
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