“The very radiance itself is a veil upon the Beloved's face; with what eyes, then, can one ever hope to behold?”
महबूब के चेहरे का नूर ही एक पर्दा बन गया है, ऐसे में समझ नहीं आता कि उसे भला किन आँखों से देखा जाए।
शायर यहाँ एक बेहद ख़ूबसूरत विरोधाभास पेश करते हैं—आमतौर पर परदा छुपाता है और रोशनी दिखाती है, लेकिन महबूब का नूर इतना तेज़ है कि वही नूर एक नक़ाब बन गया है। जब अत्यधिक रौशनी ही आँखों को चौंधिया दे, तो आम नज़रों से उस रूप को देख पाना नामुमकिन हो जाता है। इसलिए शायर हैरान होकर पूछते हैं कि उस असीम हुस्न या ईश्वरीय सत्ता का दीदार करने के लिए आख़िर किस तरह की रूहानी आँखों की ज़रूरत होगी।
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