ग़ज़ल
हश्र तक याँ दिल शकेबा चाहिए
حشر تک یاں دل شکیبا چاہئے
यह ग़ज़ल प्रेम में अपेक्षित अनंत धैर्य और मिलन की अनिश्चित प्रतीक्षा को व्यक्त करती है। इसमें शायर महबूब के अलौकिक सौंदर्य और ईश्वरीय तजल्ली के उस रहस्यमयी रूप पर विचार करता है, जिसे सामान्य मानवीय आँखों से देख पाना असंभव है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
हश्र तक याँ दिल शकेबा चाहिए
कब मिलें दिलबर से देखा चाहिए
यहाँ दिल को क़यामत (हश्र) तक सब्र रखने की ज़रूरत है, अब देखना यह है कि महबूब से मुलाक़ात कब नसीब होती है।
2
है तजल्ली भी नक़ाब-ए-रू-ए-यार
उस को किन आँखों से देखा चाहिए
महबूब के चेहरे का नूर ही एक पर्दा बन गया है, ऐसे में समझ नहीं आता कि उसे भला किन आँखों से देखा जाए।
3
ग़ैर-मुमकिन है न हो तासीर-ए-ग़म
हाल-ए-दिल फिर उस को लिक्खा चाहिए
यह नामुमकिन है कि ग़म का कोई असर न हो, इसलिए अपने दिल की हालत एक बार फिर महबूब को लिखकर भेजनी चाहिए।
4
है दिल-अफ़गारों की दिलदारी ज़रूर
गर नहीं उल्फ़त मदारा चाहिए
घायल दिल वालों को तसल्ली देना ज़रूरी है; यदि मोहब्बत नहीं कर सकते, तो कम से कम उनके साथ शिष्टाचार और सद्भाव तो बरतना चाहिए।
5
है कुछ इक बाक़ी ख़लिश उम्मीद की
ये भी मिट जाए तो फिर क्या चाहिए
दिल में अभी उम्मीद की थोड़ी सी चुभन बाकी है; अगर यह भी मिट जाए, तो फिर इसके अलावा और क्या चाहिए।
6
दोस्तों की भी न हो परवा जिसे
बे-नियाज़ी उस की देखा चाहिए
जिसे अपने दोस्तों की भी परवाह न हो, उस व्यक्ति की बेपरवाही या बेरुखी देखने लायक है।
7
भा गए हैं आप के अंदाज़ ओ नाज़
कीजिए इग़्माज़ जितना चाहिए
मुझे आपके नाज़-ओ-अंदाज़ बहुत पसंद आ गए हैं, अब आप जितनी चाहें उतनी बेरुख़ी या अनदेखी कर लीजिए।
8
शैख़ है इन की निगह जादू भरी
सोहबत-ए-रिंदाँ से बचना चाहिए
ऐ शैख़, उनकी नज़र जादू से भरी हुई है, इसलिए इन मस्त और बेपरवाह लोगों की सोहबत से दूर रहना चाहिए।
9
लग गई चुप 'हाली'-ए-रंजूर को
हाल इस का किस से पूछा चाहिए
दुखी हाली बिल्कुल चुप हो गए हैं; अब उनकी हालत के बारे में किससे पूछा जाए?
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