इश्क़ को तर्क-ए-जुनूँ से क्या ग़रज़ चर्ख़-ए-गर्दां को सुकूँ से क्या ग़रज़

“What concern has love with forsaking its madness? What business has the turning sphere with rest?”

— अल्ताफ़ हुसैन हाली
अर्थ

इश्क़ का अपने दीवानेपन को छोड़ने से कोई वास्ता नहीं है, ठीक उसी तरह जैसे निरंतर घूमने वाले आसमान को सुकून या ठहराव से कोई मतलब नहीं होता।

विस्तार

शायर यहाँ इश्क़ की फितरत की तुलना लगातार घूमते हुए आसमान से करते हैं। जैसे गर्दिश करते हुए फलक या ब्रह्मांड के लिए ठहरना नामुमकिन है, वैसे ही सच्चे इश्क़ से उसकी दीवानगी को कभी जुदा नहीं किया जा सकता। इश्क़ का वजूद ही इस बेपरवाह जुनून में है, इसलिए उससे होशमंदी या ठहराव की उम्मीद करना बेमानी है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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